सीबीआई की ओर से तीन करोड़ रुपये की रिश्वतखोरी के मामले में आईपीएस अधिकारी दीपक गहलावत की गिरफ्तारी प्रशासनिक तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की ओर फिर से ध्यान आकर्षित कर रही है। दीपक गहलावत को जिस मामले में गिरफ्तार किया गया, वह नकली दवा बनाने वाले रैकेट की जांच से जुड़ा है। इस रिश्वतखोरी कांड के समय गहलावत नागरिक उड्डयन महानिदेशालय में क्षेत्रीय निदेशक के पद पर तैनात थे। उन पर आरोप है कि उन्होंने तीन करोड़ रुपये की रिश्वत के बदले अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए नकली दवा बनाने के आरोपित कारोबारी को सीबीआई जांच से बचाने का भरोसा दिया।

उन्होंने जांच एजेंसी के अधिकारियों पर इसके लिए दबाव भी बनाया। कहना कठिन है कि इस मामले की तह तक पहुंचने और दीपक गहलावत को उनके किए की सजा दिलाने में कितना वक्त लगेगा, लेकिन यह एक तरह से बाड़ खेत को खाए वाला एक और मामला है। यह लगातार देखने में आ रहा है कि रह-रह कर ऐसे अधिकारी सामने आते ही रहते हैं, जो गंभीर किस्म के भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाते हैं। उनकी गिरफ्तारी भी होती है और उनके पास से अकूल संपत्ति भी बरामद होती है, लेकिन यह बहुत कम सुनने को मिलता है कि उन्हें कठोर दंड का भागीदार बनाया गया।

भ्रष्ट अधिकारियों को समय रहते दंड न दिए जाने का परिणाम यह है कि उनका भ्रष्टाचार बेलगाम है। कुछ मामले तो ऐसे सामने आते हैं, जो खुले-नग्न भ्रष्टाचार की कहानी कहते हैं। इन दिनों ऐसा ही एक मामला दिल्ली में सरकारी अस्पतालों के लिए दवाएं और मेडिकल उपकरणों की खरीद में घोटाले का है। यह घोटाला 650 करोड़ रुपये का बताया जा रहा है। वास्तव में यह घोटाला नहीं एक तरह की खुली लूट थी।

इसे इससे समझा जा सकता है कि बिना जरूरत कई गुना महंगे दामों पर दवाएं और मेडिकल उपकरण खरीदे गए। ऐसा लगता है कि किसी को नियम-कानूनों की कहीं कोई परवाह नहीं थी। इस मामले में स्वास्थ्य सेवाओं की पूर्व महानिदेशक डा. वत्सला अग्रवाल को गिरफ्तार किया गया है। इस घोटाले में किस तरह करोड़ों के वारे-न्यारे किए जा रहे थे, यह इससे समझा जा सकता है कि 650 करोड़ रुपये में से करीब 50 प्रतिशत भ्रष्ट अधिकारियों-कर्मचारियों की जेब में गए।

नौकरशाही का भ्रष्टाचार एक नासूर बन गया है। केंद्र और राज्य सरकारों के तमाम दावों के बाद भी नौकरशाहों के भ्रष्टाचार पर कहीं कोई प्रभावी लगाम लगती नहीं दिखती। भ्रष्ट नौकरशाही केवल सरकारी खजाने को लूटने का काम ही नहीं कर रही है, वह आम लोगों की समस्याएं बढ़ाने का भी काम कर रही है, क्योंकि जब भी कहीं भ्रष्टाचार होता है तो उससे कहीं न कहीं सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता से समझौता भी होता है।