मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर के खिलाफ 23 विपक्षी दलों के नेताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश को पत्र लिखने का औचित्य समझना कठिन है। इस पत्र का एकमात्र उद्देश्य यही जान पड़ता है कि विपक्षी दल येन-केन-प्रकारेण एसआइआर के मुद्दे को हवा देते रहना चाहते हैं, ताकि यह माहौल बनाने में आसानी हो कि चुनाव आयोग एसआइआर की प्रक्रिया के जरिये भाजपा को कथित तौर पर लाभ पहुंचा रहा है। विपक्षी दलों की ओर से यह आरोप तबसे लगाया जा रहा है, जबसे बिहार में एसआइआर कराने का फैसला किया गया।

बिहार में एसआइआर के खिलाफ विपक्षी दलों ने यह कहते हुए आसमान सिर पर उठा लिया कि वोटर लिस्ट से उनके समर्थक मतदाताओं के नाम जानबूझकर काटे जा रहे हैं, लेकिन वे इसके पक्ष में कोई प्रमाण नहीं दे सके। इतना ही नहीं, वे ऐसे मतदाताओं को भी सामने नहीं ला सके, जिनका नाम कथित तौर पर अनुचित तरीके से वोटर लिस्ट से हटा दिया गया था। एसआइआर के खिलाफ विपक्षी दलों के तमाम धरना-प्रदर्शन के बाद भी बिहार के लोगों को यह मुद्दा आकर्षित नहीं कर सका तो इसीलिए कि उन्हें विपक्ष के आरोपों में कोई दम नहीं दिखा।

बिहार विधानसभा के चुनाव नतीजे एसआइआर पर वहां की जनता की राय भी थे, लेकिन विपक्षी दलों ने उसकी अनदेखी कर इस मुद्दे को तूल देना जारी रखा और वोट चोरी को अपना नारा बना लिया। बिहार के बाद चुनाव वाले अन्य राज्यों में भी एसआइआर हुआ, लेकिन विपक्षी दलों को इस प्रक्रिया में खोट केवल बंगाल और असम में दिखी, क्योंकि यहां भाजपा ने जीत हासिल की। केरल और तमिलनाडु में हुए एसआइआर को लेकर वे मौन रहे, क्योंकि यहां के चुनाव नतीजे उनके अनुकूल रहे। विपक्षी दलों ने एसआइआर को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी, लेकिन वे वहां भी यह सिद्ध नहीं कर सके कि इस प्रक्रिया को सही तरीके से संपन्न नहीं किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट में मुंह की खाने के बाद भी विपक्षी दलों को चैन नहीं है।

समझना कठिन है कि जिस मामले में सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग के पक्ष में फैसला दे चुका और एसआइआर को उसका संवैधानिक अधिकार बता चुका, उसे लेकर प्रधान न्यायाधीश को पत्र लिखने से क्या हासिल होने वाला है? क्या ऐसा कुछ है कि इस पत्र के आधार पर सुप्रीम कोर्ट एसआइआर पर अपना फैसला बदल देगा? एसआइआर का उद्देश्य मतदाता सूचियों को सही करना है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए ऐसा करना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है। आखिर विपक्षी दलों की ओर से इस आवश्यक कार्य का विरोध क्यों किया जा रहा है? ऐसा तो है नहीं कि देश में पहली बार एसआइआर के जरिये मतदाता सूचियों को दुरुस्त किया जा रहा हो। यह काम तो पहले भी होता रहा है।