श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की बैठक में केवल महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल कुमार मिश्र के त्यागपत्र पर ही नहीं निर्णय होना चाहिए। इसी के साथ ट्रस्ट को कुछ ऐसे ठोस फैसले भी लेने चाहिए, जिनसे संदेह के बादल छंटे और लोगों को भरोसा हो कि भविष्य में मंदिर के चढ़ावे की देखरेख और हिसाब-किताब समुचित तरीके से होगा। ऐसे फैसले लेना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि चढ़ावा चोरी के प्रकरण ने हिंदू समाज की भावनाओं को बुरी तरह आहत किया है। उसकी आस्था और विश्वास को गहरी चोट पहुंची है। इसकी क्षतिपूर्ति के लिए ट्रस्ट को कठोर से कठोर फैसले लेने में हिचकिचाहट का परिचय नहीं देना चाहिए।

यदि आवश्यक समझा जाए तो ट्रस्ट को भंग कर उसके नए सिरे से गठन की पहल भी की जानी चाहिए। ट्रस्ट के पदाधिकारियों को यह आभास होना चाहिए कि इतने बड़े मामले में उन्होंने अपेक्षित गंभीरता, संवेदनशीलता और तत्परता का परिचय नहीं दिया। समझना कठिन है कि चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने पर बिना किसी छानबीन के उससे इन्कार क्यों किया गया? इसी तरह तत्काल प्रभाव से उच्चस्तरीय जांच की कोई ठोस पहल क्यों नहीं की गई? वास्तव में ऐसे एक नहीं अनेक सवाल हैं, जो ट्रस्ट के पदाधिकारियों और उनकी कार्यशैली को कठघरे में खड़ा करते हैं। महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल कुमार मिश्र के त्यागपत्र पर फैसला लेने में भी एक तरह से देरी ही की गई। आखिर इन दोनों लोगों की ओर से त्यागपत्र दिए जाने के बाद यथाशीघ्र बैठक क्यों नहीं बुलाई गई?

यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि ट्रस्ट के कुछ पदाधिकारियों ने आवश्यकता से अधिक अधिकार हासिल कर रखे थे और सब कुछ अपने ही हिसाब से कर रहे थे। इसी तरह ऐसे किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के भी पर्याप्त कारण हैं कि ट्रस्ट के सभी पदाधिकारी समान रूप से सक्रिय नहीं थे और कुछ ने किन्हीं कारणों से स्वयं को निष्क्रिय अथवा अलग-थलग कर रखा था। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि चढ़ावा चोरी के मामले की छानबीन विशेष जांच दल की ओर से की जा रही है, क्योंकि तरह-तरह के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं।

इन आरोपों से ट्रस्ट की छवि धूमिल हो रही है। चूंकि चढ़ावा चोरी के प्रकरण ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है, इसलिए राष्ट्रीय स्वयंवेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और भाजपा के साथ-साथ केंद्र एवं राज्य सरकार को भी यह देखना होगा कि इस मामले में वास्तव में दूध का दूध और पानी का पानी हो। आवश्यकता केवल इसकी नहीं है कि भक्तों के दान की राशि का हिसाब-किताब सही तरह से हो, बल्कि ऐसी कोई व्यवस्था बनाने की भी है कि दान राशि का उपयोग किन कार्यों में किया जाएगा?