अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता होने के दस दिन के अंदर ही दोनों के बीच फिर से सैन्य झड़पें शुरू हो जाना पश्चिम एशिया और साथ ही विश्व के लिए एक बुरी खबर है। अमेरिका और ईरान के बीच नए सिरे से टकराव इसलिए शुरू हुआ, क्योंकि पिछले दिनों ओमान के तट पर सिंगापुर के ध्वज वाले एक मालवाहक जहाज को निशाना बनाया गया।

हालांकि इस जहाज पर हमले में कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ, लेकिन इस हमले के पीछे ईरान का हाथ माना गया। इस हमले का नतीजा यह हुआ कि होर्मुज समुद्री मार्ग से जहाजों की निकासी का काम फिर से रोक देना पड़ा। एक अनुमान के अनुसार होर्मुज में अभी पांच सौ से अधिक जहाज फंसे हुए हैं।

ईरान की ओर से सिंगापुर के झंडे वाले जहाज को निशाना बनाए जाने का एक परिणाम यह भी हुआ कि तेल के मूल्यों में मामूली ही सही, वृद्धि भी देखी गई। ईरान ने उक्त जहाज पर हमला इसलिए किया, क्योंकि उसके अनुसार उसने उसकी कथित चेतावनी की अनदेखी की।

हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच यह समझौता हुआ है कि 60 दिनों तक होर्मुज से जहाजों को बिना किसी शुल्क के निकलने दिया जाएगा, लेकिन इसके बाद भी ईरान इस पर अड़ा है कि इस जल मार्ग से जो भी जहाज निकलें, वे उसकी अनुमति लेकर ही निकलें।

वास्तव में ईरान इस कोशिश में है कि होर्मुज पर उसका आधिपत्य स्वीकार किया जाए। यह उसकी मनमानी के अलावा और कुछ नहीं।

होर्मुज सरीखे दुनिया के सभी समुद्री व्यापारिक मार्ग स्वतंत्र नौवहन के लिए खुले हैं। एक अंतरराष्ट्रीय संधि के अनुसार किसी देश को अपने तटवर्ती समुद्री मार्ग से किसी तरह की वसूली करने या टैक्स लेने का अधिकार नहीं है। ईरान होर्मुज के मामले में यह अधिकार जबरन हासिल करना चाहता है।

उसे यह अधिकार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि होर्मुज पर उसका दावा उसकी दादागीरी के अलावा और कुछ नहीं। यह एक ऐसा मामला है, जिसमें ईरान के रुख का समर्थन नहीं किया जा सकता। यह ठीक है कि अमेरिका और इजरायल ने ईरान को अनावश्यक रूप से निशाना बनाया और पश्चिम एशिया की शांति को खतरे में डालने के साथ ही विश्व अर्थव्यवस्था के लिए संकट पैदा किया, लेकिन होर्मुज को अपने नियंत्रण में लेने की ईरान की कोशिश उसे खलनायक ही सिद्ध करने वाली है।

संभवतः होर्मुज पर ईरान के अनैतिक तरीके से आधिपत्य जमाने की कोशिश का जवाब देने के लिए ही अमेरिकी सेना ने उसके ठिकानों पर बमबारी की, लेकिन ईरान ने भी खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने में देरी नहीं की। अमेरिका और ईरान के बीच इस ताजा सैन्य झड़प से इसे लेकर संदेह पैदा हो गया है कि दोनों के बीच जिस शांति समझौते पर सहमति बनी, वह कितना टिकाऊ साबित होगा?