अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध विराम पर बनी सहमति कायम हुए 20 दिन भी नहीं हुए कि दोनों देश न केवल फिर से आमने-सामने आ गए, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने यह भी कह दिया कि मेरे हिसाब से अब युद्ध विराम खत्म हो चुका है। उन्होंने यह कहने में भी संकोच नहीं किया कि ईरान का नेतृत्व करने वाले बुरे एवं बीमार मानसिकता के हिंसक लोग हैं और अब उनसे बात करना समय की बर्बादी है। विश्व समुदाय के लिए इससे बुरी खबर और कोई नहीं हो सकती, क्योंकि यह टकराव तेल और गैस के दामों में उछाल लाने का कारण बनेगा।

अमेरिका और ईरान इसलिए फिर टकराव की राह पर आए, क्योंकि ईरान ने होर्मुज समुद्री मार्ग से गुजर रहे तीन जहाजों पर यह कहकर हमला कर दिया कि वे तय रास्ते से नहीं निकल रहे थे और उन्होंने उसकी चेतावनी की भी अनदेखी की। ईरान की इस कार्रवाई से चिढ़े अमेरिका ने न केवल उसके कई ठिकानों पर बमबारी की, बल्कि उसे दी गई तेल बिक्री की छूट भी खत्म कर दी। इसके जवाब में ईरान ने भी खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें दागीं। यह सब उस समय हो रहा है, जब ईरान अपने सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की रस्में पूरी करने में लगा हुआ है।

यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि जैसे ईरान होर्मुज पर आधिपत्य जमाने की बेजा कोशिश कर रहा है, वैसे ही अमेरिकी राष्ट्रपति भी दुनिया को यह दिखाने को आतुर हैं कि वे ईरान को अपनी शर्तों पर झुकने के लिए बाध्य करके रहेंगे। ट्रंप इसीलिए मनमानी कर पा रहे हैं, क्योंकि वे अमेरिकी संसद द्वारा युद्ध रोकने के प्रस्ताव को तब तक खारिज करने में समर्थ हैं, जब तक दोनों सदन दो तिहाई बहुमत से राष्ट्रपति के वीटो अधिकार के खिलाफ प्रस्ताव न पारित कर दें। ट्रंप के पास यह तर्क भी है कि युद्ध विराम हो जाने के कारण 60 दिन की वह समय सीमा समाप्त हो गई, जिसके तहत कहीं युद्ध छेड़ने के लिए संसद की औपचारिक मंजूरी की आवश्यकता होती है।

साफ है कि ट्रंप अपनी शक्तियों का मनमाना इस्तेमाल कर रहे हैं। सच यह भी है कि होर्मुज को लेकर ईरान भी मनमानी कर रहा है, क्योंकि वह खुद को पश्चिम एशिया का नीति-नियंता यानी दादा साबित करना चाहता है। अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता कराने वाले पाकिस्तान एवं कतर जैसे देश इसलिए असहाय और निरुपाय हैं, क्योंकि उनकी अमेरिका के सामने कोई हैसियत नहीं। पाकिस्तान तो संदेशों का आदान-प्रदान करने के अलावा और कुछ कर ही नहीं सकता। एक नाजुक युद्धविराम के खत्म होने की कगार पर पहुंचने से हैरानी नहीं, लेकिन यह विश्व अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी ही है। इससे अमेरिका, ईरान के साथ पुरी दुनिया को नुकसान होगा।