यह संतोषजनक कम, आश्चर्यजनक अधिक है कि श्रीनगर के सरकारी अस्पताल की कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट के अपहरण और हत्या के मामले में 35 वर्ष बाद आतंकी सरगना यासीन मलिक और उसके साथियों के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया गया। यासीन मलिक प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन जेकेएलएफ का प्रमुख है।

सरला भट्ट की बर्बर हत्या कश्मीर में आतंक से जुड़ी एक ऐसी खौफनाक घटना थी, जिसने घाटी से कश्मीरी पंडितों के पलायन को हवा दी थी। इस मामले में इतने लंबे समय बाद आरोप पत्र दाखिल करने की नौबत आना यही बताता है कि अपने देश में किस तरह कुछ संगीन मामलों में भी आवश्यकता से अधिक देर होती है।

जब आतंकवाद से जुड़े गंभीर मामलों में भी ऐसा होता है तो न केवल पीड़ितों के बीच निराशा घर करती है, बल्कि आतंकवाद से लड़ने की प्रतिबद्धता को लेकर भी सवाल उठते हैं। समझना कठिन है कि करीब तीन दशक से भी अधिक समय तक किसी ने इसकी आवश्यकता क्यों नहीं समझी कि सरला भट्ट को न्याय मिले?

सरला भट्ट का प्रकरण पहला ऐसा मामला नहीं, जिसमें दोषियों को कठघरे में खड़ा करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में इतनी देर हुई हो कि उसे अंधेर कहा जा सकता है। इस तरह के और भी अनेक मामले हैं, जिनमें कश्मीरी पंडितों को आतंकित करने और उन्हें पलायन के लिए विवश करने वाली हत्या और हिंसा की घटनाओं की अनदेखी की गई हो। इस अनदेखी में जम्मू-कश्मीर सरकार के साथ तत्कालीन केंद्र सरकारों की भूमिका रही।

एक पीड़ादायक तथ्य यह भी है कि एक बार सुप्रीम कोर्ट ने भी यह कहकर कश्मीरी पंडितों की हत्या के मामलों की जांच-पड़ताल की जरूरत को इस आधार पर खारिज कर दिया था कि अब बहुत देर हो चुकी है। आखिर जब अन्य मामलों की जांच-पड़ताल दशकों बाद होने के प्रसंग सामने आ चुके हों तब फिर कश्मीरी पंडितों के साथ हुए भीषण अत्याचारों के मामलों की जांच में संवेदहीनता क्यों दिखाई गई?

अफसोस की बात केवल यह नहीं कि कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अत्याचारों की अनदेखी हुई और उन्हें न्याय देने की वैसी कोई ठोस पहल नहीं हुई, जैसी अपेक्षित थी, बल्कि यह भी है कि यासीन मलिक जैसे जो आतंकी तत्व इन अत्याचारों के लिए उत्तरदायी थे, उनके खिलाफ सख्ती दिखाने और उन्हें न्याय के कठघरे में खड़ा करने से इन्कार किया गया।

इससे भी खराब बात यह हुई कि कश्मीर समस्या के समाधान में कथित तौर पर सहायक मानकर उन्हें गांधीवादी करार दिया गया। यासीन मलिक के मामले में तो ऐसा तब किया गया, जब उस पर वायुसेना के चार कर्मियों की हत्या का आरोप था। ये हत्याएं भी 1990 में की गई थीं। यह अच्छी बात यह है कि इस मामले में भी उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो रही है, लेकिन जो देरी हुई, उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती।